April 20, 2018, 4:56 am
कांग्रेस भारत का ‘कैंसर’ है, कीमोथेरेपी चालू है

कांग्रेस भारत का ‘कैंसर’ है, कीमोथेरेपी चालू है

सोनिया गांधी ने अपनी डिनर डिप्लोमेसी का जाल बिछाना शुरू कर दिया है। कल रात उन्होंने 19 दलों के आमंत्रित हर नेता को गेट पर जाकर अभिवादन किया। सोनिया गांधी ने इस भोज की हर छोटी-छोटी बात पर ध्यान दिया। यहाँ तक कि हर नेता की पसंद का खाना परोसा गया था। कहते हैं इतिहास खुद को दोहराता है। लीजिये 2004 का साल खुद को दोहराने की तैयारी में है। याद करें उस साल को जब इसी तरह क्षेत्रीय दलों को एक साथ लाकर भाजपा के खिलाफ खड़ा किया गया था। कनिमोई के लिए डोसा, उमर अब्दुल्ला के लिए कहवा, बंगाल के नेताओं के लिए झींगा मछली और बाबूलाल मरांडी के लिए पान की ख़ास व्यवस्था की गई थी। जाहिर है सोनिया गांधी अपनी मेल-मिलाप वाली उसी नीति पर चल रही हैं जिस पर चलकर उन्होंने सन 2004 में भाजपा को हरा दिया था। इतिहास खुद को दोहरा जरूर रहा है लेकिन परिदृश्य देखकर लग रहा है कि विजयश्री वरण करने के लिए कांग्रेस को चमत्कारों की उम्मीद करनी होगी। क्षेत्रीय दल आज भी कांग्रेस के साथ खड़े हैं लेकिन अपनी शक्ति खो चुके हैं। 14वें लोकसभा चुनाव-2004 के नतीजे एनडीए के लिए जबर्दस्त सदमे लेकर आए थे। भाजपा को पूरा यकीन था कि जनता उसे दोबारा केंद्र की सत्ता के सिंहासन पर बिठाएगी लेकिन 2004 लोकसभा के नतीजों ने भाजपा की सारी आकांक्षाओं पर पानी फेर दिया। ना अटल जी की साफ-सुथऱी छवि काम आई और न इंडिया शाइनिंग की अपील ने वोटरों पर कोई असर दिखाया। 145 सीटों के साथ कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर उभरी थी । बीएसपी, एसपी, एमडीएमके और लेफ्ट फ्रंट के सहयोग से कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूपीए ने केंद्र में सरकार बनाई। साल 2004 में सरकार बनाने के बावजूद कांग्रेस का पतन नज़र आने लगा था। जब कांग्रेस की अगुआई में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) की सरकार बनी तो इसमें पंद्रह से ज़्यादा दल शामिल थे। इससे देश की जनता में ये संदेश गया कि कांग्रेस अब अकेले के दम पर सरकार नहीं बना सकती। ऐसी ही बात भाजपा के लिए भी कही जाने लगी क्योंकि उस चुनाव में भाजपा को लगभग 22 फ़ीसदी मत मिले। दूसरी ओर क्षेत्रीय दलों को सबसे ज़्यादा लगभग 29 फ़ीसदी मत मिले। ध्यान दीजिये, पश्चिम बंगाल, केरल और त्रिपुरा में सीपीएम ने 43 सीटें निकाली थी। इस चुनाव के बाद कहा जाने लगा कि देश के दोनों बड़े दल अब अपना जनाधार खो बैठे हैं। 2009 के लोकसभा चुनाव में भी सोनिया गांधी की 'डिनर डिप्लोमेसी' रंग लाई। इस बार भी सरकार बनाने का पैटर्न पिछली बार की तरह रहा। क्षेत्रीय दलों की सहायता से कांग्रेस ने सरकार बनाई।कांग्रेस के नेतृत्व वाले संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन को 262 सीटें हासिल हुई। उसे बहुमत के लिए सिर्फ़ 10 और सांसदों के समर्थन की ज़रुरत थी जो उसने आसानी से जुटा लिए थे। समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और राष्ट्रीय जनता दल जैसी पार्टियों ने यूपीए को समर्थन दिया था। भाजपा ने लालकृष्ण आडवाणी के नेतृत्व में लचर प्रदर्शन करते हुए केवल 116 सीट हासिल की थी। कांग्रेस पूर्ण बहुमत न पाकर भी अन्य दलों के सहयोग से सरकार बनाती रही। इन दोनों चुनाव में कांग्रेस-भाजपा के मत प्रतिशत में कुछ ख़ास अंतर नहीं था। लेकिन कांग्रेस अपने गठजोड़ के चलते सरकार बनाती रही। 2014 के चुनाव में भाजपा ने धमाकेदार वापसी करते हुए 282 सीट हासिल की और कांग्रेस को बैकफुट पर धकेल दिया। कांग्रेस को समझ में आ गया कि मोदी के करिश्मे के आगे वे अकेले कुछ नहीं कर पाएंगे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी इस बात को समझ रहे हैं कि सोनिया गांधी 2004 का इतिहास दोहराने की कोशिश में हैं और इसलिए ही 2019 के लोकसभा चुनाव को 'महासमर' कहा जा रहा है। इन दिनों भाजपा की इस बात के लिए आलोचना हो रही है कि वे विपरीत विचारधारा के नेताओं को पार्टी में जगह दे रहे हैं। हाल ही में नरेश अग्रवाल का मामला बहुत चर्चा में रहा है। भाजपा और संघ परिवार ने हमेशा अपने कटु अनुभवों को पाठशाला में सीखे अध्याय की तरह लिया है। वे ये जान गए हैं कि सत्ता के खेल में नैतिकता की कोई जगह नहीं होती। यदि बुराई को समाप्त करना है तो बुराई की मदद भी लेनी ही होगी। अगले चुनाव के लिए कांग्रेस पुनः क्षेत्रीय दलों को जोड़ने के लिए धन-बल का इस्तेमाल कर रही है। शिवसेना, चंद्रबाबू नायडू तो भाजपा का साथ छोड़ने की तैयारी में है। नरेंद्र मोदी की सोच इस समय छह माह आगे चल रही है। उन्होंने त्रिपुरा, नागालैंड में कांग्रेस-वामपंथ का किला ध्वस्त कर दिया है, यानि महागठबंधन को एडवांस में बड़ी चोट दे दी है। वे जानते हैं कि नोटबंदी जैसे सख्त निर्णयों और मध्यप्रदेश-राजस्थान में असंतोष के कारण भाजपा स्पष्ट बहुमत के आसपास रह सकती है। यहीं कारण है कि भाजपा ने नए राज्यों में अपना जनाधार बढ़ा लिया है ताकि 2004-2009 की नाकामी पुनः न झेलनी पड़े। इस महासमर में इतनी धूल उड़ेगी कि समझ नहीं आएगा, कौन सत्य के पक्ष में है और कौन धूर्त के साथ खड़ा है। बस इस समय मोदी को एक बार और आपकी जरूरत है,  देश को बदलने के लिए। भारत की 'कीमोथेरेपी' चल रही है। क्या आप चाहते हैं 'कैंसर' ख़त्म होने से पहले 'डॉक्टर' को बाहर निकाल दिया जाए।