गुमनामी की जिंदगी जी रहा है आइंस्टीन के सिद्धांत को चुनौती देने वाला ये भारतीय वैज्ञानिक !

जिन्होने आइंस्टीन के सापेक्षता के सिद्धांत E=MC2 को चुनौती दी थी. आज उसे भारत में दर-दर की ठोकरें खाकर दो वक्त की रोटी नसीब नहीं हो रही है !

गुमनामी की जिंदगी जी रहा है आइंस्टीन के सिद्धांत को चुनौती देने वाला वैज्ञानिक, दीवार पर लिखकर कई फॉर्मूले

महान गणतिज्ञ डॉ. नारायण सिंह की गिनती दुनिया के महान गणतिज्ञों में होती है. जिन्होने आइंस्टीन के सापेक्षता के सिद्धांत E=MC2 को चुनौती दी थी. आज उसे भारत में दर-दर की ठोकरें खाकर दो वक्त की रोटी नसीब नहीं हो रही है. बहुत दुर्भाग्य की बात है कि ये सब भारत में हो रहा है.

एक बूढ़े आदमी हाथ में पेंसिल लेकर यूंही पूरे घर में चक्कर काट रहे हैं. कभी अख़बार, कभी कॉपी, कभी दीवार, कभी घर की रेलिंग, जहां भी उनका मन करता, वहां कुछ लिखते, कुछ बुदबुदाते हुए घर वाले उन्हें देखते रहते हैं, कभी आंखों में आंसू तो कभी चेहरे पर मुस्कराहट ओढ़े. यह 70 साल का ‘पगला सा’ आदमी अपने जवानी में ‘वैज्ञानिक जी’ के नाम से मशहूर था. मिलिए महान गणितज्ञ वशिष्ठ नारायण सिंह से.

वशिष्ठ नारायण सिंह

तकरीबन 40 साल से मानसिक बीमारी सिज़ोफ्रेनिया से पीड़ित वशिष्ठ नारायण सिंह पटना के एक अपार्टमेंट में गुमनामी का जीवन बिता रहे हैं. अब भी किताब, कॉपी और एक पेंसिल उनकी सबसे अच्छी दोस्त है.

पटना में उनके साथ रह रहे भाई अयोध्या सिंह बताते है, “अमरीका से वह अपने साथ 10 बक्से किताबें लाए थे, जिन्हें वह आज भी पढ़ते हैं. बाकी किसी छोटे बच्चे की तरह ही उनके लिए तीन-चार दिन में एक बार कॉपी, पेंसिल लानी पड़ती है.”

वशिष्ठ नारायण सिंह ने आंइस्टीन के सापेक्ष सिद्धांत को चुनौती दी थी. उनके बारे में मशहूर है कि नासा में अपोलो की लांचिंग से पहले जब 31 कंप्यूटर कुछ समय के लिए बंद हो गए तो कंप्यूटर ठीक होने पर उनका और कंप्यूटर्स का कैलकुलेशन एक था.

 

By: hindutva Info Writer on Monday, April 3rd, 2017