देखिये क्या हुआ जब एक मुस्लिम मौलाना ने गया – जन गण मन अधिनायक जय हे !

राष्ट्रगीत वन्देमातरम के बाद जब बात आई राष्ट्रगान के सम्मान में 52 सेकंड खड़े होने की तो…

देश में एक आम किस्म की बहस छिड़ी हुई है. कई लोग राष्ट्रगीत और राष्ट्रगान का जमकर विरोध करके अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने के फिराक में लगे हुए हैं. लोग इस हद तक गिर गए हैं कि वह देश सर्वोपरि है की परिभाषा को भूलकर राजनीति करने के चक्कर में लग गए हैं. देश में हालात इतने बदतर हो गए हैं कि तथाकथित सेकुलर समूह द्वारा खड़े किये गये विवाद के बीच धर्मनिरपेक्षता की आड़ में पहले राष्ट्रगीत वन्देमातरम पर विवाद किया गया.

फिर आया राष्ट्रगान का नम्बर और अब राष्ट्रभाषा पर भी विवाद शुरू हो गया है. वन्देमातरम, जन-गण-मन के बाद अब स्कूलों में हिंदी में होने वाली प्रार्थना पर उठाया गया है. भारत के एक हजार से ज्यादा केंद्रीय विद्यालयों में बच्चों द्वारा सुबह की सभा में गाई जाने वाली प्रार्थना पर सवाल सीधे-सीधे उठाते हुए कई दशकों से चली आ रही परंपरा पर को सवालिया निशान के दायरे में खड़ा कर दिया गया है.

इससे पहले राष्ट्रगान को सिनेमा हॉल में बजाना अनिवार्य किया गया तो इसे लेकर भी सेकुलर लोगों को बड़ी परेशानी होने लगी. लोगों की परेशानी इतनी बढ़ गई कि वह इसके विरोध में अनाप-शानाप तक बकने लगे. नतीजा सुप्रीम कोर्ट को अपने फैसले को बदलना पड़ा और कहा गया कि यह अनिवार्य नहीं है. सोचनेवाली बात यह है कि देश में देश से बड़ा कुछ भी कैसे हो गया है. देशभक्ति से बढ़कर कुछ खास वर्ग की भक्ति क्यों हो गई है ?

वहीं इस गंभीर मुद्दे पर एक मुस्लिम धर्मगुरु ने लोगों को जिस तरह से राष्ट्रगान की व्याख्या की उसे सुनकर इसका विरोध कर रहे सेकुलर लोगों के तो होश उड़ जाएंगे. उन्होंने बेहतरीन उदाहरण के जरिए बता दिया कि लोगों को क्यों “जन-गण-मन अधिनायक जय हे” का सम्मान करना चाहिए और इसे गाने से परहेज नहीं करने चाहिए.

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