वो शिव भगत जिन्होंने मुस्लिम शासक के लिए, अपने बच्चों तक की कुर्बानी दे दी

महाभारत के युद्ध के बाद जीवित बचे 18 योद्धाओं में से एक थे द्रोण पुत्र अश्वत्थामा! अश्वत्थामा को को सम्पूर्ण महाभारत में कोई नहीं हरा पाया था! अश्वत्थामा से जुड़ा एक ऐसा इतिहास जो कोई नहीं जानता! वो है उनके मोहियाल ब्राह्मण होने की और उनके वंश के मोहियाल ब्राह्मणों की वीर गाथा की! ब्राह्मण वंश के होते हुए इन्होनें एक मुस्लिम शासक के लिए अपनी हर संतान की कुर्बानी तक दे दी!

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जानिए  इन अनूठे ब्राह्मणों की अनूठी कहानी:

द्रोणाचार्य दत्त शाखा के मोहियाली ब्राहमण थे! ब्राहमण का यह ऐसा वर्ग है जो अपने को मोहियाल ब्राह्मण कहलाने में गर्व महसूस करता है! ब्राह्मण का यह वर्ग शिव भक्त कहलाते हैं और बहुत जबरदस्त लड़ाकू कहे जाते हैं! हिन्दू धर्म की रक्षा और सम्मान के लिए ये अपनी जान देते रहे हैं! इन्होंने इमाम हुसैन के लिए भी जानें दी हैं, इन्हें हुसैनी ब्राह्मण भी कहा जाता है!

ऐसी मान्यता है कि अश्वत्थामा महाभारत से बच निकल कर घायल अवस्था में इराक पहुँच कर, वहीं बस गया! अश्वत्थामा वंश के दत्त ब्राह्मणों ने इराक में अपनी बहादुरी का सिक्का जमाया! उन्होंने अरब, मध्य एशिया और इराक में अपमा साम्राज्य स्थापित किया!

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मोहम्मद के काल में दत्त ब्राह्मण का राजा राहिब सिद्ध दत्त हुआ करता था! सिद्ध निःसन्तान था और मोहम्मद साहब से सन्तान का आशीर्वाद मांगने गया! लेकिन उसे पता चला की उसके भाग्य में संतान नहीं है और वो मायूस हो कर लौटने लगा! तभी मोहम्मद साहब के छोटे नाती इमाम हुसैन ने सिद्ध दत्त को सात औलादों का आशीर्वाद दिया! हुसैन के आशीष स्वरुप सिद्ध दत्त को के यहाँ सात बेटों का जन्म हुआ और इस तरह वह मोहम्मद साहब के खानदान के संपर्क में आया!

अपने पिता हजरत अली के लिए लड़ाई लड़ते हुए 10 अक्टूबर 680 में कर्बला की घटना में इमाम हुसैन की मौत हप गई और जब इसके बारे में जब सिद्ध दत्त को पता चला तो वो बदला लेने के लिए आतुर हो उठा! सिद्ध दत्त इमाम हुसैन के एहसान को नहीं भुला था! यजीदी फ़ौज ने इमाम का सर कलम कर उसे साथ ले जा रहे थे!

तब उसने यजीदी फ़ौज का पीछा करते हुए हुसैन का सर चीन छीना और दमिश्क की ओर बढ़ा। लेकिन रास्ते में एक जगह पड़ाव पर रात में, यजीदी सैनिकों ने उन्हें घेर लिया और हुसैन के सिर की मांग की।

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सिद्ध दत्त ने इमाम का सर नहीं सौंपा, मगर उसकी जगह अपने सातों बेटे का सर काट कर उन्हें दे दिए! लेकिन फिर भी सैनिकों ने उन्हें हुसैन का सिर मानने से इंकार कर दिया। दत्त ब्राह्मण के दिल में इमाम हुसैन के कत्ल का बदला लेने की आग भड़क रही थी। अपना बदला पूरा करने के लिए वे अमीर मुख्तार के साथ मिल गए। बहादुरी से लड़ते हुए चुन-चुन कर उन्होंने हुसैन के कातिलों से बदला लिया।

हुसैन की मौत और अपने सात बेटों की कुर्बानी को याद रखने के लिए दत्त ब्राह्मण ने दर्जनों दोहे पढ़े, जो मोहर्रम में उनके घरों में पढ़े जाने लगे। यही से ही दत्त ब्राह्मण हुसैनी ब्राह्मण कहलाए।

By: Ankita on Wednesday, October 26th, 2016

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