जानिए कैसे शाहबानो सुप्रीम कोर्ट में जीतकर भी राजीव गांधी सरकार के कारण गई थी हार !

आखिर कौन थी शाहबानो और क्या था ये प्रकरण जिसमें राजीव गांधी ने लिया था ‘गलत’ फैसला !!

मुस्लिम महिलाओ ने मिलकर तीन तलाक के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अर्जी दाखिल की थी. इस पर कल फैसला सुनाया गया . पांच जजों की बेंच में तीन जजों ने इस ट्रिपल तलाक की प्रथा को असंवैधानिक करार दिया . इस प्रथा पर कोर्ट ने रोक लगाते हुए सरकार को इस संबंध में कानून बनाने के लिए कहा है .

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इस प्रकार आज सारे देश की मुस्लिम महिलाये खुशियाँ मना रही है लेकिन आज हम आपको एक ऐसी मुस्लिम महिला के बारे में बताने जा रहे है जोपने हक की लड़ाई जीतते हुए भी हार गयी . आइये जानते है कौन थी वो महिला और क्या है यह पूरा मामला .

शाहबानो इंदौर की रहने वाली एक मुस्लिम महिला थी . जिसे उसके पति मोहम्मद खान ने 1978 में तलाक दे दिया था. पांच बच्चों की मां 62 वर्षीय शाहबानो ने अपनी और अपने बच्चों की जीविका का कोई साधन न होने की वजह से पति से गुज़ारा लेने के लिये अदालत पहुचीं और कानूनी लड़ाई लड़ी और पति के खिलाफ गुजारे भत्ते का केस जीत भी लिया .

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लेकिन सुप्रीम कोर्ट में केस जीतने के बावजूद भी शाहबानो को पति से हर्जाना नहीं मिल सका क्यूंकि भारत के रूढ़िवादी मुसलमानों के अनुसार यह निर्णय उनकी संस्कृति और विधानों के खिलाफ था . इससे उन्हें असुरक्षित अनुभव हुआ और उन्होंने इसका जमकर विरोध किया .

देशभर में शाहबानो के कानूनी तलाक भत्ते पर राजनीतिक बवाल मच गया और इस विरोध प्रदर्शन को देखते हुए राजीव गांधी सरकार ने मुस्लिम महिलाओं को मिलने वाले मुआवजे को निरस्त करते हुए सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलट दिया .

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इस फैसले पर पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने भी अपनी किताब ‘द टर्बुलेंट इयर्स :1980-1996’ में शाहबानो के मामले में उस समय के प्रधानमंत्री राजीव गांधी के फैसले को गलत करार दिया था.

कहा जाता है कि ऐसा उन्होंने मुस्लिम धर्मगुरूओ के दबाव में आकर किया . इस विरोध के बाद  1986 में राजीव गांधी की सरकार ने मुस्लिम महिला अधिनियम 1986 पारित किया.  इसके तहत शाहबानो को तलाक देने वाला पति मोहम्मद गुजारा भत्ता के दायित्व से मुक्त हो गया और इस प्रकार शाहबानो सुप्रीम कोर्ट में जीतने के बावजूद राजीव गांधी सरकार के कारण हार गई थी .

By: Jyoti Kala on Thursday, August 24th, 2017