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मुसलमान भी नही जानते “ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड” का यह सच !!

गांधी जी के असहयोग आन्दोलन को जो जनसमर्थन मिला था उसने ब्रिटेन हुकूमत हिला दिए. अंग्रेजों ने मोहम्मद अली जिन्ना और मुस्लिम लीग के नेताओं जैसे लियाकत अली बंधुओं की महत्वाकांक्षा को भांप कर उस पर अम्ल किया . मुसलमानों के तो दोनों ही हाथ में लडडू था-एक तरफ़ गांधी और दूसरी तरफ़ अंग्रेज, दोनों ही मुसलमानों को लुभाने में लगे हुए थे .

बता दें कि 1937 में अंग्रेजी हुकूमत के दिशा-निर्देशों पर “आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड” की स्थापना की गयी थी . अंग्रेजों ने अपने हिसाब से मुस्लिम पर्सनल लॉ के कानून बनाये . इसमें कुरान का पालन नही किया था . कई जगहों पर यह कानून कुरान का विरोध करती नज़र आई . इससे अंग्रेजों का उद्देश्य मुस्लिम तुष्टीकरण करना था न कि मुसलमानों का विकास करना .

संविधान निर्माताओं ने भी मुस्लिम तुष्टीकरण के लिए यूनिफ़ार्म सिविल कोड बिल की जगह केवल  “हिन्दू कोड बिल” को पास किया और “यूनिफ़ार्म सिविल कोड” बिल को राज्य के नीति निदेशक तत्वों की श्रेणी में डाल दिया . संविधान निर्माताओं को जहाँ भी मुश्किल आई उन्होंने उसे राज्य के नीति निदेशक तत्वों की श्रेणी में डाल दिया गया क्योंकि “मौलिक अधिकारों” की तरह “राज्य के नीति निदेशक तत्वों” को क़ानूनी रूप से लागू नहीं किया जा सकता . इसीलिए आज तक किसी भी राज्य ने “यूनिफ़ार्म सिविल कोड” बिल को लागू करने में कोई ख़ास दिलचस्पी नहीं दिखाई .

मुस्लिम समुदाय जो ट्रिपल तलाक़ और निकाह-ए-हलाला का समर्थन करते है . वो कहते है कि यह उनका संवैधानिक अधिकार है . ऐसा बोलने वाले मुस्लिम युवाओं को यह समझ नहीं है कि मौलिक अधिकार का हनन “धार्मिक स्वतंत्रता” नही कहलाया जा सकता . अठाहरवीं सदी के इन कानूनों ने न जाने कितनी मुस्लिम महिलाओं की जिन्दगी बर्बाद कर दी . मुस्लिम महिलाओं भी ट्रिपल तलाक़ के ख़िलाफ़ तो है लेकिन “यूनिफ़ार्म सिविल कोड बिल” के समर्थन में नहीं है. इन लोगो को शरीयत कानून भी चाहिए और इंसाफ़ भी . भला यह कैसे संभव हो सकता है ??

By: Jyoti Kala on Wednesday, January 11th, 2017

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