इस एक आदमी को भारत रत्न देकर PM मोदी 2019 का चुनाव आज ही जीत लेंगे!

दो दिन पहले यानी 5 अप्रैल के ही दिन भारत में एक ऐसे व्यक्ति का जन्म हुआ था जिसने राजनैतिक इतिहास में एक रोचक पटकथा लिखी है. इस व्यक्ति का नाम है बाबू जगजीवन राम. कहा जाता है जगजीवन राम देश के सबसे बड़े दलित नेता हुए हैं. कांग्रेस के नजरिये से कहा जाए तो आंबेडकर को कड़ी टक्कर देने वाले नेता यही नेता थे. जगजीवन राम के नाम सबसे लम्बे समय तक संसद का सदस्य रहने का रिकोर्ड दर्ज है. वह 1946 से लेकर अपनी मौत के समय 1986 तक लगातार संसद के सदस्य रहे. सबसे ज्यादा समय तक मंत्रिमंडल में मंत्री रहने का रिकोर्ड भी इन्ही के नाम दर्ज है.

आजादी के बाद से ही नेहरू के मंत्रिमंडल में लेबर मिनिस्टर रहे इस दलित नेता जगजीवन राम पर कई बार आरोप लगे की उन्होंने तमाम उम्र मंत्री रहते हुए भी दलितों के लिए कुछ नहीं किया. कुछ दलितों के नेता तो उन पर यह भी आरोप लगाते हैं की वह कांग्रेस सरकार में दलितों से सिर्फ मुखौटा भर थे. वह तो नेहरू के हाथों की कठपुतली थे. हालांकि वह देश की राजनीति में उप प्रधानमंत्री की की कुर्सी तक भी पहुंचे.

उनके प्रधानमंत्री न बन पाने के पीछे दो थ्योरी सामने आई जिनमे से एक की वह दलित थे, इसलिए एंटी दलित खेमे की आपसी जुगलबंदी हो गई. चौधरी चरण सिंह की अगुवाई में मोरारजी देसाई और दुसरे ऊंची जातियों के कथित नेताओं ने उन्हें सपोर्ट दिया. अब दूसरी थ्योरी यह की जगजीवन राम की प्रतिद्वंदी इंदिरा गांधी की बहु मेनका गांधी के सम्पादन में निकलने वाली सूर्या मैगजीन में जगजीवन राम की दूसरी पत्नी से हुए बेटे सुरेश कुमार की दिल्ली यूनिवर्सिटी की स्टूडेंट सुषमा के साथ नग्न तस्वीरें छपीं.  कहा जाता है इसी बजह से जगजीवन राम की राजनितिक पूँजी मिटटी में मिल गई.

दरअसल कहा जाता है की दलितों के सबसे बड़ा चेहरा आंबेडकर ही थे. लेकिन यह बात सरासर गलत है. बाबू जगजीवन राम भी दलितों के उस वक्त से बड़े चेहरा थे. यहाँ तक की आंबेडकर से भी आगे . लेकिन गोलमेज के सम्मलेन हो रहे थे तो उस वक्त डाक्टर आंबेडकर ही दलितों के प्रतिनिधि बनकर जाते थे. हिन्दुओं के मदन मोहन मालवीय. बाद में जगजीवन राम जनता पार्टी में रहे क्यूंकि  पार्टी के लोग संघर्षशील और राजनितिक तपे तपाये तो थे लेकिन उनके पास कोई दलित चेहरा था इसलिए बाबू जगजीवन राम को अपने साथ कर लिया.

जगजीवन राम के ऐसा करने से इंदिरा को लगने लगा की अब वह चुनाव हार जायेंगी. क्यूँकी उनकी पार्टी का सबसे बड़ा दलित चेहरा उनसे टूट चुका था. दरअसल इसी बीच राजनीति के इतिहास में बड़ा ही दिलचस्प किस्सा सामने आया वो ये की इंदिरा गांधी के बेटे संजय गांधी के दरबारी उस समय के प्रसारण मंत्री हुआ करते थे. उन्होंने लोगों को हर इतवार शाम को उस जमाने की पहली बेहद अश्लील फिल्म दिखाने का फैसला किया.

यह फिल्म कांग्रेस ने लोगों को इस लिए नहीं दिखानी शुरू की के उन्हें लोगों के मनोरंजन की चिंता हुए वल्कि वो नहीं चाहते थे की बाबू जगजीवन राम की भाषण सभा में ज्यादा लोगों की भीड़ इक्कठा न होने पाए. जगजीवन राम की रैलियों और भाषण सभाओं में भारी मात्रा में लोगों की भीड़ इक्कठा होना शुरू हुई और उनके जनसमर्थन को देखकर लगने लगा की देश के इतिहास में एक दलित नेता प्रधानमंत्री की कुर्सी के बिलकुल नजदीक पहुँच रहा है.

उसी वक्त गाँधी वादी नेता मोरारजी देसाई ने जगजीवन राम को उनके बाजिब हक़ से महरूम कर दिया. यह वह मोरारजी देसाई हैं जो अपनी पेशाब की थ्योरी को लेकर काफी मशहूर हुए थे. उनके बारे में यह भी कहा जाता है वह शराब बंदी पर सख्ती से अमल किया करते थे और स्वस्थ रहने के लिए अपना ही पेशाब पीया करते थे. आलम यह था की जब प्रधानमंत्री रहते हुए मोरारजी देसाई अमेरिका गए तो सबसे ज्यादा सवाल उनके पेशाब वाली थ्योरी को लेकर ही पूछे गए.

मोरारजी देसाई सरकार में इंडस्ट्री मिनिस्टर थे जार्ज फर्नांडिस जिन्होंने कोका कोला जैसी कंपनियों को देश से बाहर निकाल दिया था. वह भी जगजीवन के साथ देश के प्रधानमंत्री की रेस में शामिल हुई थे. हालांकि ये बात अलग है की जार्ज फर्नांडिस पहले ही दो बार प्रधानमंत्री पद का चुनाव हार चुके थे. इसी बीच इन दोनों के अलावा तीसरे नेता चौधरी चरण सिंह भी थे जो प्रधानमंत्री पद के लिए उस वक्त सशक्त दावेदार माने जा रहे थे. तभी बीच में दखल ते हैं जय प्रकाश नारायण. जेपी के दखल के बाद तय हुआ की मोरारजी देसाई ही देश के प्रधानमंत्री बनेंगे.

बाद में जेपी के व्यक्तिगत आग्रह पर ही जगजीवन राम मोरारजी देसाई के मंत्रिमंडल में शामिल हुए. हालांकि वह मोरारजी देसाई के अधीन काम ही नहीं करना चाहते थे. लेकिन जगजीवन राम को कांग्रेस में सख्त प्रतिद्वंदी रही इंदिरा ने कभी माफ़ नहीं किया. जिसके चलते कहा जा सकता है की जगजीवन राम के राजनीतिक अवसान के लिए इंदिरा गांधी की बहु मेनका गांधी ही कारण बनी. क्यूंकि उनके सम्पादन में निकलने वाली पत्रिका सूर्या ने बाबू जगजीवन राम के बेटे सुरेश और सुषमा की बेहद नग्न तस्वीरे छापी और उस कहानी को पूरे देश के सामने रखा जिसके चलते जगजीवन के राजनितिक जीवन को बड़ा झटका लगा.

अब कुल मिलाकर कहा जा सकता है की अपने जमाने के बेहद बड़े दलित नेता रहे बाबू जगजीवन को मोदी सरकार अगर भारत रतन देकर सम्मानित करती है तो दलितों का झुकाव एक बार फिर मोदी जी को और हो सकता है जिसके बूते मोदी जी 2019 के लोक सभा चुनावों में फतह हासिल करने में कामयाब हो सकते हैं.

By: rana sanjay on Sunday, April 9th, 2017