जानिए रविश कुमार जी की सफल पत्रकारिता का गहरा रहस्य ।

एक लेख जो असली-नक़ली पत्रकार का अंतर स्पष्ट करेगा !!

पढ़ने के बाद शायद आप को यह रहस्य नहीं लगेगा । क्योंकि यह रहस्य है भी नहीं, हम ही देख नहीं रहे थे इसलिए समझ नहीं रहे थे ।

आप ने उनके इंटरव्यूज देखे होंगे  या पैनल डिस्कशन्स  ? हाल में BHU के VC, GC त्रिपाठी जी का इंटरव्यू भी देखा होगा। नहीं देखा होगा तो देखिये । नीचे दी गयी विडियो देखेंगे तो आपको रविश जी की सफलता का रहस्य साफ साफ समझ में आयेगा। 

बचपन में अक्सर सभी बच्चों की स्थिति यह नहीं होती की क्रिकेट बैट खरीदें । ऐसे में  जिसके पास बैट होती है उसकी चलती है ,  मेरी बैट, मेरे रूल्स टाइप में । यहाँ ये लाल माइकिया की भी कुछ वैसी ही बात है । मेरा माइक, मेरी आवाज , मेरा चैनल, मेरी बकवास । बैट वाले बच्चे को फील्डिंग करनी पड़े तो वो बैट लेकर घर जाता है या उसको मम्मी की आवाज पुकारती सुनाई देती है । यहाँ भी सामनेवाला अगर ढंग से जवाब देने लगे और रविश जी को ये बात अखरने लगे तो वे बीच में टोकते हैं और अपनी ही हाँकते हैं । बस माइक लेकर चले नहीं जाते, इतना ही फर्क है ।

कभी आप ने गौर किया है कि जिसे ये ग्रिल कर रहे हैं (वो ऑफ कोर्स इनका वैचारिक विपक्षी होता है) तब ये अपने सवाल करने में जितना समय लेते हैं उतना समय अगले को देते भी हैं ? कभी एक सवाल पूछकर जवाब मांगते भी हैं ? या फिर एक से जोड़कर कम से कम दो तीन अधिक सवाल पूछते हैं, और अगला अगर एक भी सवाल का जवाब ढंग से देने लगे तो एक मिनिट भी उसे बोलने नहीं देते, बीच में ही टोककर उसकी विचारों की लिंक तोड़ने की पुरजोर कोशिश करते हैं ? अधिकतर समय पर सफल भी होते हैं और उस वक़्त उनकी कुटिल हंसी उनकी दुष्टता को उजागर कर देती है । आँखें देखिये उनकी, समझ जाएँगे । चपाती जैसा गोल चेहरा लाख मासूम बेचारा परेशान रखने की कोशिश करते हैं लेकिन आँखें विष उगलती हैं ।

VIA 

वैसे ये वीसी साहब तो उनके कतई बराबरी के नहीं थे लेकिन उनके एक सिम्पल सी बात से लाल माइकिया तानाशाह बौखला गए । उन्होने जब कहा कि आप मुझे बोलने ही नहीं दे रहे तो रविश कुमार जी हड्बड़ा गए । फिर टेढ़ी दुम आदत से मजबूर लेकिन वीसी साहब उनको टोकते कि जवाब देने तो दो, बीच में टोंक रहे हैं तो उनको चुप होना पड़ता, शराफत का मुखौटा फट जाता तो कैसे चलता ? अफसोस है कि वीसी साहब इस नस को दबाकर गेम के नियम बदल न सके । उनका core competence वो नहीं था ।

वैसे, क्या आप जानना चाहते हैं कि ऐसे गेम के नियमों को  कैसे fair and equitable किए जा सकता है ? आसान है । जैसे रविश जी पहले सवालों की बौछार करें तो कहिए कि कृपया एक एक सवाल अलग अलग पूछिये,  मैं आप के जितना तेज दिमाग का नहीं हूँ कि सभी प्रश्न याद रक्खूँ और उनके सिलसिलेवार उत्तर दूँ । अब चूंकि आप स्टुडियो में आ गए हैं, दर्शकों से आप का परिचय भी करा दिया गया है तो आप को वे जाने को भी नहीं कह सकते । उसके बाद जब वे आदत से मजबूर होकर  बीच जवाब में टोकने लग जाएँगे तो ऑन कैमरा बोल दीजिये कि आप हमें बोलने नहीं दे रहे । उन्हें चुप होना पड़ेगा । फिर कह दीजिये कि वे इस शर्त का जब जब उल्लंघन करेंगे तो आप कुछ संकेत दे देंगे जिससे उनको और साथ साथ दर्शक भी समझ सकते हैं कि वे अपनी ही मानी हुई शर्त को तोड़ रहे हैं । जैसे जेब से विजिटिंग कार्ड निकाल कर उसके सफ़ेद पृष्ठ भाग पर लाल मार्कर से मोटे अक्षरों में FOUL लिखिए । ये उठाकर दिखाना है । या लाल रुमाल अगर रखा हो । संकेत विशिष्ट होना चाहिए नॉर्मल भाव भंगिमा में खपनेवाला नहीं । आप देखेंगे कि ये कितने असहज हो जाएँगे । अगर आप में उतनी वैचारिक क्षमता, अभ्यास और उत्तर देने की क्षमता है तो आप के जाने के बाद उनका नर्वस ब्रेकडाउन भी हो सकता है । हाँ, दुबारा आप को वे आमंत्रित नहीं करेंगे ये तय है । बैट वाले लड़के को फील्डिंग करना कभी अच्छा लगता है क्या ?

क्या आप ने सोचा है कि ऐसे लोग लोकप्रिय होते ही क्यों हैं ? मान लिया कि उनकी भाषा शैली बहुत परले दर्जे की होती है, बोलने की अदा हाँ, अदा ही, और नहीं तो क्या बहुत शालीन होती है, लेकिन क्या इतना ही काफी है ? उनके प्रोग्राम से दर्शक कुछ मौलिक take away पाता भी हैं कभी ? क्या याद रहता है ?

यही ना कि किसी नामचीन हस्ती के कपड़े फाड़े गए ? इससे अधिक कुछ ? तो ये इतने  लोकप्रिय क्यों होते है ?

इसका उत्तर शायद कुछ लोगों को अच्छा न लगे । हम सबमें आगे बढ़ने की ललक होती है। उसका सरलतम उपाय आगे वाले को गिरा देना है। यह बचकाना भाव सबमें होता है, किसी में कम, किसी में अधिक । इसी का दमन कर सभ्य समाज बनता है मगर यह हम सबमें होता अवश्य है। रवीश जैसे लोग इसी भाव का दोहन करते हैं। किसी यशस्वी, स्थापित व्यक्ति के कपड़े रवीश जी फाड़े और लोगों को आनंद आये तो उसका यही कारण है। एक बात बताइये, फिल्मों में दुबला सा हीरो दस बीस तगड़े हथियारबंद गुंडों को मारता था तो आप को अच्छा लगता था या नहीं ? फिर ताकतवर विलेन जो एक बड़ा आदमी भी होता था उससे भी उसकी मारामारी होती थी और विलेन मार खाने के साथ साथ सब के सामने बेइज्जत भी हो जाता था। सब को यह अच्छा लगता था इसलिए तो फिल्में चली, भाई । ये सब की सुप्त या दबी हुई मानसिक इच्छाएँ होती हैं ।

यहाँ रविश जी वही हीरो हैं । दुबला पतला पत्रकार, चपाती जैसा मासूम गोल चेहरा, केवल शब्द बाणों से नामी गिरामी हस्तियों को पसीना ला देता है । और ये फिल्म का काल्पनिक प्लॉट भी नहीं, वास्तव है, आप आपनी आँखों से होता हुआ देख सकते हैं । Much easier to relate to ! शो देखकर आप को भी लगता है कि ये आप की अपनी ही जीत है ।

तो ये रहा इनकी और इनके जैसे लोगों के यश का रहस्य । बस आँखों के सामने ही पड़ा था, किसी की नजर जा नहीं रही थी । मैंने उठाकर सामने रख दिया इतना ही है ।  दुख केवल इतना है ऐसे लोगों के कारण पत्रकारिता का नाम खराब हुआ । दर्जा भी । सच में, बाबा भारती जैसी फीलिंग आती है लेकिन अब कोई खरक सिंह नहीं रहे ।