क्लास में पढ़ने भी नहीं जाना चाहते जेनयू के विद्यार्थी

जवाहर लाल नेहरू को सिगरेट पीने की बहुत लत थी। वे सार्वजानिक स्थलों पर भी खुद को सिगरेट पीने से रोक नहीं पाते थे। फिर उनको ऐसी जगहों पर फोटों खिंचवाने का बड़ा शौक था, जहाँ फोटोग्राफी निषेध के बोर्ड लगे हो। नेहरू जी की और भी कई आदतें थी जो सार्वजनिक रूप से झलक जाती थी। उनके नाम पर बने जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में विद्यार्थियों का एक धड़ा आज भी नेहरू जी की आदतों को प्रासंगिक बनाए हुए हैं।

सार्वजानिक स्थानों पर सिगरेट पीने पर पाबंदी है लेकिन जेएनयू में नहीं। नियमों को तोड़ने में सबसे आगे यहीं के छात्र होते हैं। नेहरू जी की रंगीनियत भी यहाँ ख़त्म नहीं होने दी गई। ये तथ्य है कि एक बार जेएनयू की ‘संस्कृति’ को देखते हुए यहाँ एक कंडोम वेडिंग मशीन लगा दी गई थी। जेएनयू में पढ़ाई करने वाले अब कम रह गए हैं। इसका प्रमाण है जेएनयू छात्र संघ का अजीबोगरीब आंदोलन। जेनयू प्रशासन ने पिछली दिसंबर में एक सर्कुलर जारी कर घोषणा कर दी कि स्नातक, स्नातकोतर छात्रों ही नहीं, बल्कि एमफिल और पीएचडी शोधार्थी को भी अपनी हाजरी देनी होगी। इस घोषणा से आजादी पसंद छात्र संघ बिफर गया। उन्हें ये घोषणा जेएनयू के आजाद और प्रगतिशील चरित्र पर आक्रमण करती हुई लग रही है।

पढ़ाई करने के लिए क्लास में नहीं जाना जेनयू में एक फैशन बन गया है। ये बुनियादी सवाल है कि इन्हे पढ़ाई नहीं करनी है तो यूनिवर्सिटी में आते ही क्यों हैं। इनको लगता है कि कुलपति जेएनयू को स्कूल बना देना चाहते हैं। सब क्लास में जाएंगे तो जेएनयू के प्रगतिशील चरित्र का नाश हो जाएगा। भारत तेरे टुकड़े होंगे के नारे कैसे लगाएंगे। कुलपति की ये पहल स्वाभाविक रूप से सकारात्मक है लेकिन इसे भी अभिव्यक्ति की आजादी से जोड़ा जा रहा है। पिछले दिनों छात्रसंघ के सदस्यों ने यूनिवर्सिटी में पकौड़े तल दिए। मोदी के बयान के विरोध में किये गए इस विरोध में इन छात्रों ने जेएनयू के नियम तोड़े। कुलपति ने सख्त एक्शन लेते हुए इन चार छात्रों पर अस्सी हज़ार का आर्थिक दंड ठोंक दिया।

मोदी विरोध के नाम पर इन्होंने साबरमती बस स्टैंड के पास सड़क को ब्लॉक किया। जिसके कारण छात्रों और बाकी सारे स्टाफ को काफी परेशानियों का सामना करना पड़ा। प्रदर्शन के स्थान पर रात को फिल्म भी दिखाई और इलेक्ट्रिक केबल चुराकर ले गए। ये है जेएनयू की प्रगतिशीलता। पढ़ाई-लिखाई से इनको कोई मतलब नहीं है। वामपंथियों और कांग्रेस के प्रभाव में आकर ये अपने कॅरियर से खिलवाड़ कर रहे हैं। आखिर सरकार इस बदनाम विश्यविद्यालय पर करोड़ो की राशि खर्च करती है तो क्या इस तरह की हरकतों के लिए।

अब समय आ गया है कि जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के अब तक के योगदान की समीक्षा करनी होगी। सरकारी पैसों पर पल रहे अधेड़ अराजकवादियों ने देश को क्या दिया ये पूछना होगा। आखिर इस विचारवान कुनबे ने देश को कौनसी दिशा प्रदान की है। सिगरेट, शराब और कंडोम से इतर कुछ संस्कार भी दिए हैं या केवल अधेड़ों-बेरोजगारों का जमावड़ा करने के लिए ये यूनिवर्सिटी खोली गई है। जो छात्र पढ़ाई करने के लिए कक्षा में जाने से मना कर देते हो, वे छात्र कहलाने के लायक हैं क्या।