मृत्यु के बाद … क्या सच में किसी को मिल सकती है मोक्ष प्राप्ति !!

मृत्यु के पश्चात आत्मा का गूढ़ और रहस्यमयी सफर…

जीवन का सबके बड़ा सच है – मृत्यु ! उस के बाद क्या होता है ये जानने की सब को जिज्ञासा होती है | गरुड़ पुराण में कहा है कि मृत्यु के बाद प्राणशक्ति अनंत में विलीन हो जाती है, और आत्मा १४ स्तरों से गुजरती है, जिस में ७ सकारात्मक होतें है (जिन्हें सप्तलोग कहते हैं) और बाकी के ७ नकारात्मक होते हैं (जिन्हें सप्तपाताल कहते हैं) | अगर मरते समय कोई वासना बाकी रह गयी हो, तो उसे पूरी करने के लिए जीवात्मा फिर से जनम लेता है ऐसा श्री भगवद गीता में लिखा है | जैसे हमारे कर्म है, वैसे ही हमें स्तर मिलते हैं | अच्छे कर्मों से हम सकारात्मक स्तर (स्वर्ग) से गुजरते हैं और बुरे कर्मों से हम नकारात्मक स्तर (नर्क) से गुजरते हैं |

माना जाता है कि आत्मा अमर होती है | आत्मा अवनाशी, चिरंतन, निर्गुण, निराकार है | ना तो इसे कोई देख सकता है और ना ही कोई सुन सकता है (गीता: २-२०) | आइनस्टाइन की theory of relativity में यही कहा गया है कि शक्ति (energy) निरंतर होती है | उसका सिर्फ एक प्रकार से दूसरे प्रकार में रूपांतर होता है |ठीक उसी तरह प्राणशक्ति या जीवात्मा एक योनि से दूसरी योनि में जन्म लेती है | ऐसे ८४ लक्ष योनि में जीवआत्मा सफर करता है, जिस के बाद मनुष्य योनि का जन्म मिलता है |

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मोक्ष पाने की आकांक्षा :

सभी प्राणियों में से मनुष्य ही ईश्वर की सबसे प्रगत रचना है | उस का दिमाग अन्य सारे प्राणियों की अपेक्षा ज्यादा विक्सित होता है | वो भला-बुरा सोच सकता है | श्रीमद भगवद गीता के चौदहवे अध्याय के अनुसार मनुष्य तीन प्रकार के होते हैं – सात्विक, राजसी और तामसी | इस में सात्विक मनुष्य ईश्वर के दिए पथ पर चल कर लोगों का भला करते हैं | प्रेम और दया की भावना प्रसारित करतें हैं | राजसी लोगों में प्रेम की भावना के साथ साथ क्रोध और घमंड की भावनाओं का भी समावेश होता है | तामसी लोग सिर्फ क्रोध, हिंसा और घमंड से भरे पुरे रहतें हैं |

सात्विक लोग अपने जिंदगी में अपने साथ दूसरों की भी भलाई करते हैं | वे किसी का बुरा नहीं सोचते और बुरा करते भी नहीं | राजसी लोगो में अच्छे गुण होने के साथ-साथ काम, क्रोध, मद और मत्सर के भी अंश होते है | तामसी लोग ये सोचते हैं “आप मर गए, पीछे डूब गयी दुनिया |”, और बेतहाशा जिंदगी जी लेते है | उनके लिए पाप या पुण्य की कोई परिभाषा नहीं होती |

किसी भी इंसान के मन में लालच या शत्रुत्व की भावना का असर हुआ तो मनुष्य सुखी नहीं रह सकता और पाप करने पर मजबूर होता है | इसे वह मोक्ष का अधिकारी नहीं हो सकता और फिर से जन्म-मृत्यु के चक्रव्यूह में पड़ जाता है |

जानिये स्वर्गलोक और नर्कलोक के अनुभव !!

ब्रिटैन में डॉ. पर्निया और उसके टीम ने मृत्यु के समीप आये हुए लोगों पर प्रयोग किए हैं, जिसमें यह प्रणाम निकला है कि उन लोगों को निर्लिप्तता, उत्तोलन, संपूर्ण विलयन और दीप्तिमान प्रकाश महसूस होता है | यह अनुभव सभी धर्म ग्रंथों में भी बताया गया है कि जब शरीर से आत्मा का उद्गमन होता है |

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संसार के हर धर्म ग्रंथ में स्वर्ग और नर्क का समान वर्णन है | स्वर्ग में सुख और शांति होती है | परमेश्वर का सान्निध्य प्राप्त होता है | हालांकि नर्क में सारे दुःख, कठिनाइयां, यातनाएं और जिल्लत का सामना करना पड़ता है | हमारे पुराणों में तो जीवात्मा को उबलते तेल की कढ़ाई में डालते है; फिर उसपर कोड़े बरसातें हैं और तरह तरह के अन्य अत्याचार किये जातें हैं | ऐसे स्थिति में कौन चाहेगा की उसे नर्क नसीब हो ? लेकिन कुछ पुराणों में ऐसा भी कहा गया है कि मनुष्य जितने पुण्य कर्म करता है, उसके अनुसार ही स्वर्गलोक का उपभोग लेकर जीवात्मा फिर से पृथ्वी पर जन्म लेती है |

तो फिर कैसे मिलेगा मोक्ष ? पढ़िए कुछ अनसुनी बातें !!

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इसीलिए ईश्वर पर श्रद्धा रखने वाले परिपक्व लोग मोक्ष की इच्छा करते हैं और रोजमर्रा की ज़िन्दगी जीने के साथ परमेश्वर की साधना, अच्छे कर्म और सात्विकता से जिंदगी गुजारते हैं | हमारे संतों की भी यही सीख है | जिस तरह कछुआ संकट में अपने पैर कवच के अंदर समेट लेता है, उसी तरह अपने सब विकारों को स्थित प्रज्ञता के कवच के अंदर समेटकर ईश्वर की शरण में जाना चाहिए (गीता: २-५८) | लेकिन लालच की कोई सीमा नहीं होती है और अगर सुख के लालच से आप पाप के अधिकारी हो जाए तो मोक्ष कैसे मिलेगा ?

इस मृत्युलोक में हमें हमारे कर्मों के अनुसार प्रारब्ध मिलता है | अगर हमारे कर्म अच्छे हो, हम कभी किसी को दुःख न पहुचाए, पुण्य के काम करें, वासना और काम, क्रोध, मद, मत्सर पर काबू रखें, तो हम जन्म-मृत्यु के चक्कर से छुटकारा पाकर मोक्ष की अपेक्षा अवश्य कर सकते हैं |

हर कोई यही चाहता है कि उसे या तो स्वर्ग मिले, या इस जन्म-मृत्यु के चक्कर से छुटकारा | यही बात भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में कही है:
“यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धामं परमं मम “