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आँकड़ों का खेल : UP में भाजपा की जीत कैसे होगी इसके सनसनीख़ेज़ आँकडें आए सामने !!

लोगों को ये अच्छा लगता है कि उन्हें चुनावी आकड़ों के साथ समझाया जाए और उन आकड़ों के दम पर ही उन्हें यक़ीन होता है। सही भी है पढ़े लिखे लोग ऐसे तो बिलकुल भी यक़ीन नहीं कर पाते। लेकिन पाकिस्तान के खिलाफ़ हुयी सर्जिकल स्ट्राइक और नोटबंदी के मुद्दे ने भारत के PM मोदी को निर्णय लेने वाला मजबूत और लोकप्रिय नेता बना दिया है। लोगों को यक़ीन हो गया है कुछ करेगा तो यही नेता करेगा बाक़ी तो सब नौटंकी ही नौटंकी है।

ग़ौरतलब है कि 2014 के लोकसभा चुनाव में मोदी लहर की वजह से भाजपा ने UP में 73 लोकसभा सीटें जीती थी और इसमें ख़ास बात ये रही कि राज्य में पिछली 30 सालों में पहली बार किसी दल को इतना प्रचंड बहुमत मिला था यहाँ तक की राम मन्दिर के मुद्दे पर भी भाजपा यूपी में 73 कमल नहीं खिला पायी थी । ये UP में हुए करिश्मे का ही कमाल था कि दिल्ली में भाजपा ने पहली बार पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई थी ।

अब ज़रा जान लें कि यूपी के लोकसभा चुनाव में भाजपा का वोट शेयर 42.3 फ़ीसदी था । यहाँ ये भी जान लेना बेहद ज़रूरी है कि 2007 के विधानसभा चुनाव में जब बीएसपी ने भारी बहुमत से यूपी की सत्ता पर कब्जा किया था, तब मायावती को केवल 30 % वोट शेयर ही प्राप्त हुआ था यानी भाजपा से काफ़ी कम और 2012 विधानसभा चुनाव में जब सपा ने सरकार बनायी थी और उन्होंने 224 सीटें जीतकर प्रचंड बहुमत के साथ सरकार बनाई थी तब सपा को केवल 27.3 प्रतिशत वोट ही प्राप्त हुए थे । ऐसे में भगवा रणनीतिकारों की माने तो अगर यूपी में भाजपा के वोट शेयर में 8-12 प्रतिशत तक की गिरावट होती है तो भी भाजपा पूर्ण बहुमत से सत्ता हासिल कर लेगी ।

सबसे बड़ी बात ये है कि लोकसभा चुनाव के बाद भाजपा ने किसी भी चुनाव में “इतना बड़ा नुक्सान” (मतलब 8-12 फ़ीसदी का ) नहीं उठाया है , इसमें बिहार और दिल्ली के चुनावों का आँकड़ा भी शामिल है यानी वहाँ हार के बावजूद भाजपा को 8-12 % का नुक़सान लोकसभा चुनाव के मुक़ाबले नहीं हुआ था । हालांकि भाजपा को बिहार और दिल्ली के विधानसभा चुनावों में तगड़ी हार का सामना करना पड़ा था ।दिल्ली विधान सभा के चुनाव में कांग्रेस का लगभग सारा वोट यानी 12-15 % आम आदमी पार्टी को ट्रांसफर हो गया था । लेकिन भाजपा ने अपना लोकसभा चुनाव वाला वोट शेयर बचाया था यानी भाजपा के वोट शेयर में ख़ास कमी नहीं आयी थी। बता दें कि दिल्ली के लोकसभा चुनाव में सभी सीटें भाजपा ने जीती थी  यानी क्लीन स्वीप किया था । उत्तर प्रदेश की बात करें तो मोदी विरोधियों के पास ना बिहार वाला नीतीश लालू गठजोड़ है और ना ही कोई दूसरा इतना ताक़तवर कि उसको किसी एक का सारा का सारा वोट ट्रान्स्फ़र हो जाए  ।

2014 के लोकसभा चुनाव को विधानसभा सीटों के हिसाब से देखें तो UP की 403 विधान क्षेत्रों में से BJP  ने 328 विधानसभा क्षेत्रों पर विजय प्राप्त की थी यानि भाजपा ने न सिर्फ़ 81 प्रतिशत विधान सभा क्षेत्रो में विजय हासिल की बल्कि यह जीत विशाल अंतर से हासिल की गयी थी । यूपी में चतुष्कोणीय मुक़ाबला होता है. ऐसे में कोई भी पार्टी अगर 25-30 फ़ीसदी वोट हासिल कर लेती है तो भी चुनाव जीत जाती है.  लोकसभा चुनाव में, भाजपा ने यूपी की 324 सीटों पर भाजपा का वोट शेयर 30 प्रतिशत से अधिक था. 253 विधानसभा क्षेत्रों में भाजपा को 40 प्रतिशत से अधिक और 94 सीटों पर 50 प्रतिशत से अधिक वोट शेयर मिला था. हलांकि लोकसभा चुनाव और विधानसभा में बड़ा फ़र्क है. फ़िर भी भाजपा अगर यहाँ से विधान सभा चुनाव हारती है तो निसंदेह भगवा पार्टी के लिए सबसे अधिक बुरी खबर होगी ।

अब केवल एक बात भाजपा को UP में हरवा सकती है और वो है समाजवादी पार्टी का सारा का सारा वोट मायावती को मिल जाए जैसे की दिल्ली में केजरीवाल को कांग्रेस का वोट मिला था , लेकिन इसके लिए समाजवादी पार्टी को ३० सीटों पर सिमटना होगा  और उत्तर प्रदेश की राजनीति के जानकार मानते हैं कि चाहे कुछ भी हो जाए समाजवादियों को साठ (६०  ) सीटें तो ज़रूर मिलेंगी । तो अगर ऐसा होता है तो फिर भाजपा का रोक पाना किसी के भी बस में नहीं होगा लेकिन भाजपा के नेता और अति उत्साही भगवा वादियों को ज़्यादा ख़ुश होने की ज़रूरत नहीं है और एक एक क़दम फूँक फूँक कर रखने की ज़रूरत है क्यूँकि UP का चुनाव ये तय करेगा कि देश में मोदी युग रहेगा या चला जाएगा  ।

By: HStaff on Monday, January 9th, 2017

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