पोखरण परीक्षण के 20 साल, अमेरिका को चकमा देने के लिए क्रिकेट खेलते थे सेना के जवान

0
113

Sharing is caring!

– हर रविवार पूरे दिन 25-25 ओवर का क्रिकेट मैच होता था
– कर्नल गोपाल टी कौशिक ने बताया कि कैसे उस वक्त इस मिशन को गोपनीय रखा जाता था

जोधपुर.वर्ष 1998, 11 और 13 मई। इन दो तारीखों को राजस्थान के पोखरण परमाणु स्थल पर पांच परमाणु परीक्षण किए थे। इसी के साथ हम परमाणु संपन्न देश बन गए थे। सफलता का बड़ा कारण मिशन की गोपनीयता थी। अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए की आंखों में धूल झोंकने की बड़ी जिम्मेदारी सेना की 58 इंजीनियर्स रेजीमेंट की थी। इस रेजिमेंट के तत्कालीन सीओ कर्नल गोपाल टी कौशिक ने बताया कि कैसे उस वक्त इस मिशन को गोपनीय रखा जाता था-

जनवरी 1997 को मेरी रेजीमेंट की पोखरण फायरिंग रेंज में तैनाती हुई। इससे पहले पांच यूनिट परमाणु परीक्षण की तैयारियां कर चुकी थीं, लेकिन हर बार अमेरिकी खुफिया सैटेलाइट इन तैयारियों को पकड़ लेती थी और मिशन फ्लॉप हो जाता। 1982 से 1995 तक कई बार प्रयास हो चुका था। 1995 में प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव ने परीक्षण की तैयारी शुरू करवाई थी, तब सैटेलाइट ने पकड़ लिया और तुरंत ही तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने प्रधानमंत्री राव को फोन कर परीक्षण रुकवा दिया।

वर्ष 1996 में जब प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की 13 दिन की सरकार बनी थी, तब उन्होंने परीक्षण की तैयारी को मंजूरी दे दी। इसके बाद हमारी यूनिट वहां पहुंची। पहले की गलतियों से सबक लेते हुए छह परीक्षण के कुएं और साइट तैयार करने थे।

क्रिकेट की पिच तैयार की

सबसे बड़ी चुनौती अमेरिकी सैटेलाइट ‘आई इन द स्काई’ से बचकर ऑपरेशन पूरा करना था। सैटेलाइट भी ऐसे थे जो जमीन पर खड़े व्यक्ति को किताब पढ़ते हुए या उसके हाथ में पहनी घड़ी तक को कैच कर लेते थे। यहां तक कि बादलों के बीच भी सब कुछ दिख जाता था। एक सैटेलाइट 1 अरब डॉलर का था। सीआईए के चार से ज्यादा सैटेलाइट खासतौर से पोखरण फायरिंग रेंज के ऊपर मंडराते थे। इन सबसे बचते हुए मैंने यूनिट के साथ तैयारी शुरू की। हमने ये निर्णय किया कि पोखरण रेंज में एक साथ कई एक्टिविटी दिखाएंगे, ताकि ये लगेगा कि सेना यहां पर युद्धाभ्यास कर रही है। साथ ही पूरा सीक्रेट मिशन तैयार किया। सबसे पहले हमने क्रिकेट की पिच तैयार की और मैदान जैसा स्वरूप दे दिया। पूरे क्षेत्र में रंग बिरंगे झंडे लगाए। लाइव कमेन्ट्री की व्यवस्था की गई। मंच बनाया गया और दर्शकों के बैठने की व्यवस्था की गई।

25-25 ओवर के मैच खेलते थे

इसके बाद हर रविवार पूरे दिन क्रिकेट मैच का आयोजन होता। उस समय 25-25 ओवर के मैच का आयोजन होता। मैच भी यूनिट की सभी कंपनियों के बीच में होते थे। मैच के दौरान ही जब पूरी यूनिट खेल रही होती थी, तब दो से चार जवान साइट पर जाकर ऑपरेशन की तैयारी को अंजाम देकर वापस आ जाते। जिससे सैटेलाइट में क्रिकेट मैच का नजारा ही कैद होता और ऑपरेशन की साइट पर केमोफ्लाइज यानी छद्म आवरण की जाली होने के कारण कुछ भी नहीं दिखता था। बीच में वाजपेयी सरकार गिर गई तो परीक्षण का काम रोक लिया, इसके बाद दोबारा सत्ता में आते ही काम शुरू किया।

ट्रकों में भरकर रेत लाए और कुओं में भर दी गई थी

परीक्षण से पहले एसेम्बल किए गए परमाणु बम कुएं के पास रखने के लिए मिट्‌टी के कट्‌टे डालकर प्लेटफार्म बनाने थे, इस काम में छह दिन लगते और सैटेलाइट में पकड़े जाते। ऐसे में लोहे के पाइप से ढांचे बनाकर महज डेढ़ घंटे में प्लेटफार्म तैयार कर लिया गया। सबसे बड़ी चुनौती थी परीक्षण के लिए पहले से मौके पर खुदे पड़े तीन कुओं में (प्रत्येक 800 से 1000 मीटर गहरे और 14 फीट चौड़े) बम रखने के बाद रेडियो विकिरण से बचने के लिए रेत भरना। पहले रेत के धोरों के विपरीत दिशा में रेत एकत्रित करने के कारण पकड़े गए थे। ऐसे में 10 मई की रात ट्रकों में भरकर रेत लाए और कुओं में भर दी। खेतोलाई के परीक्षण स्थल से दस किमी दूर नौतला गांव में पुराने दो कुएं मिले थे, जिन्हें पांच सौ फीट गहरा खोदा गया था। इसके अलावा इस साइट के पास ही एक और पुराना कुआं खोदकर तैयार कर लिया था।

पहले परीक्षण के बाद 12 मई की रात नौतला गांव के दो कुओं में बम स्थापित करने के बाद रेत भर दी गई। जबकि छठे कुएं को तैयार तो किया गया था, लेकिन पहले के तीन बड़े परीक्षण सफल रहने के कारण तत्कालीन प्रधानमंत्री वाजयपेयी ने छठा परीक्षण करने से मना कर दिया था। 13 मई को दो और कुओं में ही परीक्षण किया गया। यानी कुल पांच सफल परमाणु परीक्षण कर लिए गए। इन तैयारियों के दौरान परीक्षण के जनक डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम व डॉ. राज गोपाल चिदम्बरम तथा अनिल काकोडकर आते जाते थे। सभी परीक्षण सफल होने के बाद मेरी पूरी यूनिट ने इतिहास रच दिया।

सीक्रेसी के कारण सफल हुआ ऑपरेशन

पूरे ऑपरेशन के दौरान सबसे बड़ी चुनौती सीक्रेसी की थी। इसके लिए मैंने यूनिट के तीस लोगों को ही इस बारे में बताया, अन्य 700 लोगों को बाद में इसकी जानकारी मिली। जवानों की छुट्टियों पर रोक लगाने की बजाय उन्हें रुटीन छुट्‌टी दी जाती, लेकिन उनसे एक शपथ ली गई कि देश हित में जो काम कर रहे हंै, उस बारे में अपनी पत्नी को भी शेयर नहीं करेंगे। यहां तक पोखरण में पीसीओ पर बातचीत के दौरान एक जेसीओ की मौजूदगी में जवानों को अपने घर पर बात करवाई जाती थी, ताकि वे दूसरी बात नहीं कर सकें। दूसरी ओर मैं भी एक या दो अफसरों सहित सीधे पीएमओ को ही रिपोर्ट कर रहा था।

Sharing is caring!

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here