कर्नाटक विधानसभा चुनाव : एक्जिट पोल ने खोली अपनी पोल

0
150

Sharing is caring!

एक्जिट पोल ने खुद अपनी पोल खोल दी है। 8 एक्जिट पोल, 8 नतीजे। अगर बीजेपी और कांग्रेस के नज़रिए से देखें तो 5 एक्जिट पोल में बीजेपी सरकार बनाती दिख रही है वहीं 3 में कांग्रेस। जेडीएस के नजरिए से देखा जाए तो इन एक्जिट पोल में उसे कम से कम 18 और अधिक से धिक 40 सीटें मिलती दिख रही हैं।

कई न्यूज़ चैनल्स और वेबसाइट ने सभी एक्जिट पोल का औसत निकाल लिया है और उस हिसाब से बीजेपी की सरकार बनाने का वे दावा भी कर रहे हैं। कतिपय राजनीतिक विश्लेषक और टीवी पत्रकार एक्जिट पोल का इस तरह से भी विश्लेषण करते देखे गये कि चूकि पांच एक्जिट पोल के नतीजे बीजेपी के पक्ष में हैं इसलिए सरकार बीजेपी की ही बनने जा रही है। कांग्रेस के हक में सिर्फ तीन एक्जिट पोल के नतीजे हैं तो उसकी कर्नाटक में भी छुट्टी होने जा रही है।

एक्जिट पोल को लेकर जो सवाल पैदा हो रहे हैं वो ये हैं-

  • एक्जिट पोल के 8 अनुमानों में इतना फर्क क्यों है?
  • पूर्वानुमान के मुकाबले भी एक्जिट पोल में फर्क क्यों दिख रहा है?
  • बाद में अपना चेहरा छिपा लेने वाले भी एक्जिट पोल लेकर कैसे सामने आ जाते हैं?
  • क्या टीआरपी और विज्ञापनों में हिस्सेदारी का अवसर बन गया है एक्जिट पोल?
  • क्या ये एक्जिट पोल न्यूज़ चैनलों की सरकार के प्रति प्रतिबद्धता को इंगित करता है?


बीजेपी को जिन 5 एक्जिट पोल्स में बढ़त मिली है उनमें एबीपी-सी वोटर, रिपब्लिक-जन की बात, न्यूज़ नेशन, न्यूज़ एक्स-सीएनएक्स और चाणक्य शामिल हैं। चाणक्य ने बीजेपी को सबसे ज्यादा 120 सीटें दी है तो एबीपी-सी वोटर ने 101-113 तक का रेंज बीजेपी के हक में दिखाया है।

कांग्रेस को बहुमत मिलता दिखाने वाले एक्जिट पोल्स में इंडिया टीवी-वीएमआर, इंडिया टुडे-एक्सिस और टाइम्स नाउ-वीएमआर शामिल हैं। मगर, इन एक्जिटल पोल्स में भी कांग्रेस को बहुत आरामदायक बहुमत मिलता नहीं बताया गया है।

मान लिया जाए कि बीजेपी को बहुमत मिल जाता है। इसका मतलब ये हुआ कि तीन प्रमुख चैनल इंडिया टीवी, आजतक और टाइम्स नाउ पर दिखाए गये एक्जिट पोल झूठे थे। क्या जवाब होगा इन चैनलों के पास? यह पूर्वानुमान भी नहीं है कि किन्तु, परन्तु से कोई बचाव हो सके। फर्क अगर मामूली हो, तो एक्जिट पोल का भी बचाव किया जा सकता है। कहने का मतलब ये है कि वैज्ञानिक आधारों का दावा करने वाले इन एक्जिट पोल में जो पारदर्शिता की कमी है उसी का फायदा उठाया जा रहा है। तथ्य कम, अनुमान ज्यादा। जबकि बताया ये जाता है कि अनुमान कम और तथ्य ज्यादा ही इसका आधार हैं।

अगर मान लिया जाए कि कांग्रेस की जीत हो जाती है तो जिन पांच चैनलों पर अलग-अलग एक्जिट पोल चले हैं वे मुंह दिखाने लायक नहीं रह जाते हैं। आखिर ऐसे एक्जिट पोल को दिखाकर जनता को बेवकूफ बनाने की इजाजत क्यों दी जानी चाहिए?

क्या ये पत्रकारिता है? पत्रकारिता अनुमान पर आधारित नहीं होती, तथ्य और विश्लेषण पर आधारित होती है। अगर ये कह दिया जाता कि ये एक्जिट पोल वैज्ञानिक नहीं है बल्कि विश्लेषण पर आधारित है तो पत्रकारिता की भूल-चूक का भी सम्मान होता।

मगर, वैज्ञानिक बताकर एक्जिट पोल को ज्योतिषी विद्या से भी बड़ी विद्या स्थापित कर दी गयी है। ज्योतिषी को ढोंग कहा जाता है। वैज्ञानिक तर्क के नाम पर इसे झुठलाया जाता है। कोई ये बताए कि कैसे एक्जिट पोल किसी ज्योतिषी अनुमान से अधिक वैज्ञानिक है।

एक्जिट पोल ने अपनी पोल खोल दी है। उसने वैज्ञानिकता के नाटक से पर्दा उतार दिया है। न्यूज़ चैनलों को बाज़ार में बने रहने के लिए, अधिक से अधिक मुनाफाखोरी के लिए, चाटुकारिता या एजेंडा पत्रकारिता को चलाते रहने के लिए प्री पोल और एक्जिट पोल के अवसर मिले हैं, इसे तुरंत खत्म किया जाना चाहिए।

Sharing is caring!

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here